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أمّى.. حَدّوتة البيْتِ الكَبْير!

مساحة حرة

أحمد الغرباوي
أحمد الغرباوي

أحمد الغرباوى

أمّى لاتحْزَنى..
لَمْ يَعُد لنا بَيْت..


أطلالُ رَائحة عُمْر..
أطلالُ أهْلٍ فى رَوْاح فَقْد..
وَرْدُ النوافذ أُسْكت عن عَمْد..
وأبَتْ الذّكرى فى الروح خُلد..
الذّكْرَى للروح دوام حَيْاة عُمْر..
الذّكْرَى للعاشق عِرْض وَجدْ..
كم تَسْتّرتِ بالحُبّ.. و 
ورَحْلتِ فى غَيْد..
وكثيرون التحفوا بالمَال والعقارات..
 وَلهثوا للمّ فدّادين أرْضْ.. 
وعَاشوا فى عُرْىّ..!
وإذا ما ترامى لنواياهم رُؤى وَجْه
أفرغوا المائدة من الزّاد
ومن كُلّ لُقمة استخسروا فينا الطّعم..!
وخبّوا حقائب السّفر إدّعاء 
إدّعاء فاقة  و..  وَزُهدْ..!
كم قارون يرحل وهو يظنّ
أنه اشترى وهو يَبْع غَصبْ..!
،،،،،
أمّى لاتحْزَنى..
لَمْ يَعُد لنا بَيْت..


ونَسيْنا أنّ (الحُجرات) احْتواء وِدّ..
أنّ (الصّالة) لَمّة فى الله حُبّ..
أنّ (السلالم) بُسْاط ينادى مُحِبّ..
أنّ السّاكن حِجارة مِنْ أبنيْة الربّ
ليْس فى حاجة لـ (بوّاب) ولا (حارس) أمن..
كُنْت يا أمّى جَنّة أرْض
والجنّة يَحْرُسَها رَبّ..!
إيمانٌ لايَحْمل للغدّ هَمّ..!
،،،،
أمّى لاتحْزَنى..
لَمْ يَعُد لنا بَيْت..


علّمتينا أن البَيْت إنْسان
وليْس الإنسان بُنيان وبُرجْ..
ما جَدْوى كوخ أو قصر 
وفى ثوبِ عَدْل يرتعُ  فيه غَىّ..
وشهوة اكتناز دون حَدّ..؟
ما جَدْوى الدًّنيْا
يوم تزفّ على حُطام وبقايا نَفْسْ..
وفى ليلة عُرس حُضْن جَفّ..
وآياد مِتْحَنيّة بِسمّ
تتمنّى فى الروح تَعِسّ..!
فما عَادَ فى ترهلات جَسْد حِسّ..
وغَشْي الشَيْب بِعَدّ
حِسْابات وأرقام بلارِضْى رِزق
ولا قناعة فى شجن أُنسْ..!
،،،،
أمّى لاتحْزَنى..
لَمْ يَعُد لنا بَيْت..


ما عَاد يَصْلُحُ إلا للمَوْت
بَنَيْنا قبراً فوق قبر
علّينا أدواراً
وخصّصنا لكُلّ مَنّا رَقْم لَحدْ..!
دارٌ ماعاد بَعْدَكِ بَيْت
علّمتينا أن الدّار إنْسان
والإنسان قلب يحيا بقلب
وكم دار غدت للإنسان قبرْ..!
يَخْجلُ مِنّا وفاء.. ويفرُّ 
يضيع المَعْنى فى حَرْف..!
بَيْن تُراب الهدّ يَتوه نَثرْ..
ضوء يظلم.. وقنديل ينطفأ
رحلتِ؛ وينفدُ الزيْت نَضْبَ كَرْ..
سرابات مىّ وغرق وهمْ..
خلّفت جوّانا مَوْت
موتٌّ يجرى فى دَمّ..!


سامحينا يا أمّى..
كان عَليْنا أن يغدو للموت قبرْ..؟
نمهّد للذى لابُدّ أن يجىء شَطّ..
ولحومنا دون حُبّك على أكُفّ
أكفانٌ لأمانات  وِرثْ..!
ذبائح مُعلّقة على أسياخ رثّ..!


أمّى..
تهدّل حِتّة حِتّة  ثدىّ..
والصدر أنفاسٌ تضيق سِجنْ..
قيدٌ بلا.. بلاحِنيّة خَطوْ..!
،،،،
أمّى لاتحزْنى..
لم يعُد لنا بيْت..


لايهمّ هَدّ البَيْت
غضبوا من كلمى صِدقْ
ثاروا من حَرْفى صرخْ
فما ذنب القلب.. و
ويعانى خطيئة حُضْن..
والقبلة تشدّ القبلة مُرّ..
ماذنب الروح تتمزّق تفرّق وخَدْعْ..؟
شفاهٌ تتشقّق.. تأبى
تأبى الأكل لُقمة بلانِفْسْ..
وأيضاً مغموسة بِمَسّ عَيْن..!


جدّتى.. أمّى.. أختى..
أين أنْتم..
أين أنْتم مِنْ هذا الزّمن الغَثّ..
متكحّل بهتاناً؛ ومَطلىٌّ بزيْفْ..
عصفور.. وصَيْد.. وقَنْص
ولَصّ الهِدْمة حَتّى
مِنْ على عَوْرة أىّ حدّ..!
فرخٌ لم يتعلّم الطير بَعْد
يرحل الحمام فى عَمْد مَوْت 
ويغتصبونه فى هَدّ عِشّ..!


،،،،،
أمّى لاتحزْنى..
ما عَاد لنا بَيْت
ماعَاد لنا وطن..!
وعلى رُخام (البُرج) أكتب:
هنا كان لنا بَيْتْ..
هنا كان لنا وطنْ..
والوطن كان لنا أهلَ..
والأهل لأرواحنا كانوا بَدَنْ..!
هنا كانت (ليلى)
حدّوتة حُبّ.. حدّوتة كُلّ أمّْ..!


أمّى..
هنا  جُثث ومقابر دَفْن
مَيّت
مَيّت فى ثَوْب حَيّ..!
ليْتنا لم نَكُن اليوم
وليْتكِ..
لَيتكِ ما كُنْتِ فينا أمسْ..!


أمّى لاتحزْنى..
لم يعُد لنا بيْت..
لَم يَعُد لنا وَطن..!
ليْتنا..
ليْتنا لم نَكُن..!
لابعدك شيء.. و كُلّ شيء بعدك 
غدا ثمنه بَخسْ..!
وليتكِ..
ليتكِ ماكنت فِينا أمسْ..!
......
(إهداء..
إلى أمى.. وكُلّ أمّ..)
أ.غ








































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أ.غ




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